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निरायमय संचेतना

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समाज में जिस तरह के नकारात्मक परिवर्तन आये है, उस आधार पर विधि-व्यवस्था और मानव के विचार एवं जीवनशैली भी नकारात्‍मकता का आकार ग्रहण कर चुंकी है। शायद यही विकास और विकसित होने की परिभाषा है। इस परिभाषा ने क्या नहीं बदला हैं  ? ... मन भी बदला। माथा भी बदला और देखते-देखते इस धरती की काया भी बदल ड़ाली है।   भोग-बहुभोग की लालसा ने को उत्तरोत्तर अभाव की मानसिकता के घेरों में सिमट लिया है। चारो तरफ लुट मची है। जल प्रवाह सिकुड रहे हैं। जंगलों का दायरा सिमट रहा हैं। जुगून-पंतगे-केंचुए सब कही खो से रहें हैं। बहुमूल्य वनस्पतीयां ,  जीव-जंतुओं की प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। साथ ही साथ अंतरिक खुशहाली का अनुभव भी गुम हो रहा है। बच गया है ,  तो वह है.. नैसर्गिक संसाधनों की कमी का आभास और भोग-अतिभोग के लिए प्रतिस्पर्धा और प्रतिहिंसा के साथ-साथ उपभोग के नये-नये रास्तों और नये-नये उपकरणों का निजात। एक तरफ असिम संग्रह है और दूसरी ओर अभाव ग्रस्तों का संघर्ष। एक तरफ प्राकृतिक संसाधनों की कमी का आभास है और दूसरी ओर भोग-बहुभोग हेतु कृत्रिम उपभोग के उपकरणों का सजता अंबार है। जिससे न हव

गिलोय के औषधीय गुण

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गिलोय (Tinospora Cordifolia)  एक प्रकार की बेल है जो आमतौर पर जगंलों-झाड़ियों में पाई जाती है। प्राचीन काल से ही गिलोय को एक आयुर्वेदिक औषधि के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। गिलोय के फायदों को देखते हुए ही हाल के कुछ सालों से अब लोगों में इसके प्रति जागरुकता बढ़ी है और अब लोग गिलोय की बेल अपने घरों में लगाने लगे हैं। हालांकि अभी भी अधिकांश लोग गिलोय की पहचान ठीक से नहीं कर पाते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गिलोय की पहचान करना बहुत आसान है। इसकी पत्तियों का आकार पान के पत्तों के जैसा होता है और इनका रंग गाढ़ा हरा होता है। आप गिलोय  को सजावटी पौधे के रुप में भी अपने घरों में लगा सकते हैं।  गिलोय को गुडूची (Guduchi), अमृता आदि नामों से भी जाना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार गिलोय की बेल जिस पेड़ पर चढ़ती है उसके गुणों को भी अपने अंदर समाहित कर लेती है, इसलिए नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलोय की बेल को औषधि के लिहाज से सर्वोत्तम माना जाता है। इसे नीम गिलोय के नाम से जाना जाता है।  गिलोय में पाए जाने वाले पोषक तत्व :  गिलोय में गिलोइन नामक ग्लूकोसाइड और टीनोस्पोरिन, पामेरिन एवं टीनोस्पोरिक एसिड प

विनोबा : कर्म, ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय

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भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे की जयंती पर अशोक भारत जी का लेख  12 वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य का संकल्प  तथा 21 वें वर्ष में ब्रह्म साक्षात्कार की जिज्ञासा से गृह त्याग करनेवाले  संत विनोबा जी का जीवन अद्वैत की अखंड साधना तथा गीता से ओतप्रोत और संपुष्ट था । उनका जन्म 11 सितंबर 1895 को  गागोदे ,   रायगड महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम नरहरि शम्भू राव भावे था। उनका पूरा नाम विनायक नरहरि भावे था। पांच भाई बहनों में विनोबा जी सबसे बड़े थे। सबसे छोटे का नाम दत्तात्रेय था। उनकी मृत्यु बचपन में हो गई। बहन शांता बाई की भी शादी के बाद छोटी उम्र में मृत्यु हो गई। शेष दो भाई बालकोवा और शिवाजी भी विनोबा जी की तरह बालब्रह्मचारी थे और उन्होंने भी अपना जीवन विद्याध्ययन और समाजसेवा में लगा दिया।  उनके दादा शंभू राव  तथा  माता रुक्मिणी बाई ( रखुमाई)  बहुत ही उच्च विचार एवं धार्मिक प्रवृत्ति के थे।  विनायक पर उनके दादा एवं माता के शिक्षा का गहरा असर पड़ा। विनोबा जी  के शब्दों में ' अगर उन्हें मां की शिक्षा नहीं मिलती तो उन्हें  भूदानयज्ञ का विचार नहीं सुझता। '   दरअसल विनो